भागवत गीता में कई गहराई से भरे श्लोक हैं, और यहां कुछ महत्वपूर्ण श्लोकों के हिंदी में परिभाषाएँ हैं:
"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत,
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।"
जब जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, हे भारत, तब तब मैं अपने आपको प्रकट करता हूँ।
(अध्याय 4, श्लोक 7)
स्पष्टीकरण: यह श्लोक दर्शाता है कि जब समाज में नैतिकता और न्याय की कमी होती है और अधर्म धर्म को छाँव में ले लेता है, तो दिव्य अवतार या सर्वोच्च चैतन्य स्वयं को प्रकट करता है ताकि संतुलन को बहाल किया जाए और धर्म स्थापित हो सके।
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन,
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।"
तेरा कर्तव्य कर्मों में ही है, फलों में कभी नहीं। मत कर्मफल के लिए कर्म कर, न ही कर्म में आसक्ति रख।
(अध्याय 2, श्लोक 47)
स्पष्टीकरण: यह श्लोक बताता है कि हमें अपने कर्तव्यों में लगन चाहिए, फलों में नहीं। हमें कर्मफल के लिए कर्म नहीं करना चाहिए, बल्कि कर्म में आसक्ति नहीं रखनी चाहिए।
"योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय,
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।"
हे धनञ्जय, कर्मों में योग में तू स्थित रहकर संग से त्याग कर, सिद्धि और असिद्धि में समान बनकर समत्व को योग कहा जाता है।
(अध्याय 2, श्लोक 48)
स्पष्टीकरण: यह श्लोक बताता है कि हमें कर्मों में योग में स्थित रहकर आसक्ति को त्यागना चाहिए। हमें सिद्धि और असिद्धि में समान बनकर समत्व को योग कहा जाता है।
"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही।"
जैसे कि पुराने वस्त्रों को त्यागकर मनुष्य नए वस्त्र पहनता है,
वैसे ही शरीरों को त्यागकर जीर्ण शरीरी अन्य नये शरीरों को प्राप्त होता है।
(अध्याय 2, श्लोक 22)
स्पष्टीकरण: यह श्लोक दर्शाता है कि जैसे व्यक्ति पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र पहनता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने जीर्ण शरीरों को छोड़कर नए शरीरों को प्राप्त होता है।
"दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता,
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव।
भोक्तारं यज्ञस्य तपसां सर्वलोकमहेश्वरम्॥"
दैवी संपत्ति मुक्ति के लिए बांधने और आसुरी संपत्ति को बचाने वाली मानी जाती है। हे पाण्डव, तू चिंता मत कर, तू धार्मिक संपत्ति का ध्यान न रखने वाला है, तू सब लोकों के ईश्वर हो।
(अध्याय 16, श्लोक 5)
स्पष्टीकरण: यह श्लोक बताता है कि दैवी संपत्ति मुक्ति को प्राप्त करने और आसुरी संपत्ति से बचने वाली मानी जाती है। हे पाण्डव, तू चिंता न कर, तू धार्मिक संपत्ति को ध्यान में नहीं रखता है, तू सभी लोकों के ईश्वर है।
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